Saturday, July 5, 2008

सुरूर

कौन कहता है हम ने पी ज्यादा
दोस्तों हम से तो गिरी ज्यादा

एक तेरे ग़म का भी सुरूर रहा
फिर यह काफिर भी कुछ चढी ज्यादा

तेरी नज़रों की जालसाजी में
हो गई हम से मयकशी ज्यादा

आज बैठा था बेहिजाब कोई
आज ही उठी प्यास भी ज्यादा

नामाबर उल्टे पाँव लौट आया
तेरे कूचे थी रौशनी ज्यादा

इसलिए अक्ल साथ छोड़ गई
हम ने की दिल की पैरवी ज्यादा

जितने गम हो निबाह कर लेंगे
दिल पे अच्छी नहीं खुशी ज्यादा।

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