This is a nice poem which you will certainly like.
यह रात है यह चाँद है पर तुम नहीं हो
ये लौ है ये चिराग है पर तुम नहीं हो
रात की खामोशियों में बस तुम्हारी
आवाज़ ही आवाज़ है पर तुम नहीं हो
मेरे काँधे पर तुम्हारे गेसुओं की
छुवन का एहसास है पर तुम नही हो
आज भी मेरे सिरहाने पर तुम्हारी
एक अधखुली किताब है पर तुम नहीं हो
उस मेज़ की दराज़ में रखा तुम्हारा
एक ख़त भी मेरे पास है पर तुम नहीं हो.
Sunday, July 6, 2008
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